सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ आरोपों के आधार पर नेताओं को मंत्री बनने से नहीं रोक सकते

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नई दिल्ली: आपराधिक मामलों का सामना कर रहे नेताओं को मंत्री बनाने पर रोक लगाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि केवल आपराधिक कार्यवाही शुरू हो जाने के आधार पर किसी नेता को मंत्री पद से दूर रखने के लिए न्यायिक दिशा-निर्देश तय करना कई नई समस्याएं खड़ी कर सकता है। राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कराए जा सकते हैं और उनका इस्तेमाल राजनीतिक बदले के हथियार के तौर पर भी हो सकता है। ऐसे में सिर्फ आरोपों के आधार पर किसी जनप्रतिनिधि को मंत्री पद के लिए अयोग्य ठहराना उचित नहीं होगा।
भारत के मुख्य न्यायाधीश ( CJI ) की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि आपराधिक मुकदमों की शुरुआत हमेशा निष्पक्ष परिस्थितियों में ही नहीं होती। कई बार राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए भी आपराधिक कार्रवाई का सहारा लिया जा सकता है। ऐसे में अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज होते ही उसे मंत्री बनने से रोक दिया जाए, तो इस व्यवस्था का दुरुपयोग होने की आशंका रहेगी। अदालत ने इसी व्यावहारिक चुनौती को देखते हुए मंत्रियों की नियुक्ति के लिए एक समान न्यायिक मानक तय करने पर सवाल उठाए।
याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों में मंत्रियों की नियुक्ति के लिए दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई थी। खास तौर पर ऐसे नेताओं को मंत्री बनाए जाने से रोकने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप चाहा गया था, जो आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे हैं। याचिका में कहा गया था कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को मंत्रिमंडल में नियुक्तियों की सिफारिश करने का संवैधानिक अधिकार मिला हुआ है। लेकिन इस विवेकाधिकार का इस्तेमाल करते समय सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और शुचिता का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
मंत्रियों की नियुक्ति और आपराधिक मामलों से जुड़े इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट पहले भी विचार कर चुका है। 2014 में मनोज नरूला बनाम भारत संघ मामले में संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि अदालत न्यायिक व्याख्या के जरिए जनप्रतिनिधियों की अयोग्यता के लिए नए नियम नहीं जोड़ सकती। हालांकि, कोर्ट ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों से अपेक्षा की थी कि वे अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल जिम्मेदारी से करें और गंभीर या जघन्य आपराधिक मामलों, खासकर भ्रष्टाचार जैसे आरोपों का सामना कर रहे लोगों को मंत्री बनाने से बचें।
संविधान पीठ ने अपने फैसले में यह भी साफ किया था कि मंत्रियों की नियुक्ति पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाने के लिए नए नियम बनाना संसद और संबंधित राज्य विधानसभाओं के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत ने माना था कि इस दिशा में जरूरी कानूनी प्रावधान करना विधायिका का काम है। ऐसे में मंत्रियों की नियुक्ति के मामले में न्यायपालिका के लिए नए प्रतिबंध तय करने के बजाय प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों से संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने की अपेक्षा की जाती है।
साभार नवभारत टाइम्स 

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