भयानक कलयुग: दुनिया में हाहाकार, आखिर कहाँ खो गया शांति और सुकून?
संपादकीय विशेष
गोपाल गावंडे की कलम से

संपादक — रंजीत टाइम्स
दुनिया बदल रही है…
लेकिन सवाल यह है कि
हम विकास की ओर बढ़ रहे हैं, या विनाश की ओर?
पिछले कुछ वर्षों को पलटकर देखिए।
कभी महामारी ने पूरी दुनिया को घरों में कैद कर दिया,
कभी भूकंप ने बसे-बसाए शहरों को मलबे में बदल दिया,
कभी बाढ़ गाँव और शहर बहा ले गई,
कहीं जंगल आग में जलते रहे,
तो कहीं युद्ध ने मासूम बच्चों के हाथों से उनका बचपन छीन लिया।
कोरोना आया तो पहली बार लगा—
जिस इंसान को अपनी ताकत और विज्ञान पर इतना घमंड था,
उसे एक अदृश्य वायरस ने चारदीवारी में बंद कर दिया।
पैसा बैंक में पड़ा था,
गाड़ियाँ पार्किंग में खड़ी थीं,
हवाई जहाज जमीन पर थे,
बड़े-बड़े बाजार बंद थे…
और इंसान सिर्फ एक चीज माँग रहा था—
“हे भगवान, बस मेरी साँस बचा देना।”
महामारी से बाहर निकले तो लगा
अब शायद दुनिया फिर शांत होगी।
लेकिन कहाँ?
कहीं युद्ध की आग भड़क उठी,
कहीं मिसाइलें आसमान चीरने लगीं,
कहीं ड्रोन मंडराने लगे।
कहीं धरती काँप रही है,
कहीं पहाड़ टूट रहे हैं,
कहीं नदियाँ अपना रौद्र रूप दिखा रही हैं।
आखिर यह हो क्या रहा है?
क्या प्रकृति हमें कोई संदेश दे रही है?
या हमने ही प्रकृति की चेतावनियाँ सुनना बंद कर दिया है?
हमने जंगल काटे,
पहाड़ खोदे,
नदियों के रास्ते रोके,
धरती का सीना चीरकर कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए।
और फिर जब प्रकृति अपना रास्ता माँगती है,
तो हम कहते हैं—
“प्राकृतिक आपदा आ गई!”
लेकिन हर घटना को केवल “कलयुग” कहकर छोड़ देना भी उचित नहीं।
हमें अपने आप से पूछना होगा—
इस तबाही में प्रकृति का कितना हिस्सा है
और इंसान की गलतियों का कितना?
आज हमारे पास विज्ञान है,
तकनीक है,
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है,
आसमान छूती इमारतें हैं,
दुनिया को मिटा देने वाले हथियार हैं…
पर क्या हमारे पास शांति है?
क्या हमारे पास सुकून है?
क्या हमारे पास इतना समय है
कि हम अपने परिवार के साथ बैठकर दो पल हँस सकें?
शायद नहीं।
हमने दुनिया से जुड़ने के लिए इंटरनेट बना लिया,
लेकिन अपने घर के लोगों से दूर हो गए।
हमने हजारों किलोमीटर दूर बैठे व्यक्ति को
वीडियो कॉल करना सीख लिया,
लेकिन पास बैठे माँ-बाप का चेहरा पढ़ना भूल गए।
हमने घर बड़े कर लिए,
दिल छोटे कर लिए।
सुविधाएँ बढ़ा लीं,
संतोष घटा लिया।
धन बढ़ा लिया,
सुकून खो दिया।
ज्ञान बढ़ा लिया,
मानवता कहीं पीछे छोड़ दी।
यही शायद आज के कलयुग की
सबसे भयावह तस्वीर है।
कलयुग केवल भूकंप, बाढ़, महामारी और युद्ध का नाम नहीं।
कलयुग शायद वह भी है—
जब इंसान की जान से ज्यादा जमीन की कीमत हो जाए।
जब रिश्तों से ज्यादा पैसा महत्वपूर्ण हो जाए।
जब धर्म इंसान को जोड़ने के बजाय लड़ाने लगे।
जब सत्ता के लिए खून बहने लगे।
जब माता-पिता जीवित हों
और बच्चों के पास उनके लिए समय न हो।
जब हजारों “फॉलोअर्स” हों
लेकिन दुःख सुनने वाला एक सच्चा दोस्त न हो।
और जब इंसान पूरी दुनिया जीतने निकल पड़े,
पर अपने मन को न जीत पाए।
आज जरूरत डरने की नहीं,
जागने की है।
प्रकृति से फिर दोस्ती करनी होगी।
पेड़ बचाने होंगे।
पानी बचाना होगा।
पहाड़ बचाने होंगे।
नदियाँ बचानी होंगी।
लेकिन इन सबसे पहले—
इंसान के अंदर के इंसान को बचाना होगा।
युद्ध से कोई दुनिया नहीं जीतता।
एक पक्ष जीत भी जाए,
तो दूसरी तरफ किसी माँ का बेटा मरता है,
किसी बच्चे का पिता जाता है,
किसी पत्नी का सुहाग उजड़ता है।
इसलिए दुनिया को हथियारों से ज्यादा
संवाद की जरूरत है।
नफरत से ज्यादा
प्रेम की जरूरत है।
दौलत से ज्यादा
संतोष की जरूरत है।
और विकास से पहले
विवेक की जरूरत है।
वरना एक दिन आने वाली पीढ़ी हमसे पूछेगी—
“आपने हमारे लिए पैसा तो बहुत कमाया,
ऊँची इमारतें भी बनाईं,
तकनीक भी दे दी…
लेकिन हमारे रहने लायक शांत और सुरक्षित दुनिया कहाँ छोड़ी?”
उस दिन शायद हमारे पास कोई उत्तर नहीं होगा।
इसलिए अभी भी समय है।
रुकिए… सोचिए… और संभलिए।
प्रकृति को बचाइए।
परिवार को बचाइए।
रिश्तों को बचाइए।
मानवता को बचाइए।
और सबसे बढ़कर—
इस धरती की शांति को बचाइए।
क्योंकि याद रखिए—
पृथ्वी हमारे बिना भी रह सकती है,
लेकिन हम पृथ्वी के बिना नहीं।
और शायद आज समय हमसे केवल इतना ही कह रहा है—
“हे मनुष्य! अब भी संभल जा…
वरना अगली तबाही के बाद
पछताने के लिए भी बहुत कुछ बाकी नहीं रहेगा।”
✍️ गोपाल गावंडे की कलम से
संपादक

