श्री कृष्ण द्वारा वर्णित योगक्षेम की अनुभूति ही है सहजयोग
योग - परमात्मा से एकाकारिता
क्षेम - जीवन का कल्याण
आज से लगभग छः हजार वर्ष पूर्व श्री कृष्ण का अवतरण हुआ। श्री कृष्ण लीला मथुरा के कारागृह से प्रारंभ होकर द्वारिका के विनाश पर समाप्त होती है। हम सभी उनकी विभिन्न लीलाओं से भलीभांति परिचित हैं। उनका प्रत्येक कार्य विशिष्ट उद्देश्य के लिए किया गया था, तथा इनके माध्यम से आने वाले युग की नींव उनके द्वारा स्थापित की गई। कलियुग में भ्रांति की प्रधानता है परंतु यही पुनरुत्थान व सत्य की प्राप्ति का युग भी है। श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जब जब धर्म की हानि हो तब तब मैं धर्म की स्थापना के लिए अवतरित होता हूं। धर्म की वास्तविक स्थापना उनके द्वारा महाभारत के युद्ध में की जाती है जहां वे अर्जुन को गीता का संदेश देते हैं। गीता कोई एक किताब नहीं जिसका शाब्दिक अनुवाद किया जा सके। गीता भगवान कृष्ण के भक्ति योग, कर्म योग, व ज्ञान योग की एक जीवंत प्रस्तुति है। परंतु गीता के योग को समझने के लिए साधक को पहले योगी होना होगा क्योंकि गीता अनन्य भक्ति, निष्काम काम व सहज ज्ञान का उपदेश देती है। जिसे समझना आत्म साक्षात्कार की प्राप्ति के बिना संभव नहीं।
वास्तव में गीता में भगवान श्री कृष्ण आज के सहज योग का वर्णन करते हैं वे कहते हैं, आपको सभी धर्मों से परे जाना है। मनुष्य के अंदर के साधक को वे यह संदेश देते हैं कि उसे सत्य की पहचान करनी होगी, साक्षी स्वरूप होना होगा, कर्मकांड को छोड़ना होगा, संतुलन को प्राप्त कर गुणातीत, कालातीत व धर्मातीत हो कर कर्मयोग को अपना साधन बनाना होगा।
श्रीकृष्ण का अपने भक्तों को संदेश हैं -
योगक्षेमं वहाम्यहम्'-- अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति करा देना 'योग' है और प्राप्त सामग्री की रक्षा करना 'क्षेम' है। भगवान् कहते हैं कि मुझ में नित्य-निरन्तर लगे हुए भक्तों का योगक्षेम मैं वहन करता हूं।
श्री माताजी निर्मला देवी जी द्वारा प्रतिस्थापित सहजयोग योगक्षेम प्रदान करने वाला सहज मार्ग है। सहजयोग में कुंडलिनी जागरण द्वारा आत्मसाक्षात्कार प्राप्ति होती है और तब साधक श्री कृष्ण को आत्मसात कर अनन्य भक्ति को प्राप्त कर लेता है।
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