भूजल सर्वे के नाम पर हजारों की वसूली, लाखों खर्च करने के बाद भी नहीं मिला पानी!
जर्मनी की साढ़े तीन लाख की मशीन का दावा, आधे घंटे के सर्वे के लिए 5 से 20 हजार रुपये तक शुल्क! आखिर वैज्ञानिक जांच के नाम पर आम जनता को क्या मिल रहा है?
दैनिक रणजीत टाइम्स | विशेष खोजी रिपोर्ट
इंदौर। आज के आधुनिक और वैज्ञानिक युग में जब तकनीक के माध्यम से जमीन के भीतर की संरचना का अध्ययन किया जा सकता है, तब भूजल खोजने वाली मशीनों के नाम पर किए जा रहे बड़े-बड़े दावे सवालों के घेरे में हैं। किसानों, जमीन मालिकों और फार्महाउस संचालकों से भूजल सर्वेक्षण के नाम पर हजारों रुपये लिए जा रहे हैं। लेकिन सर्वे के आधार पर लाखों रुपये खर्च कर बोरवेल कराने के बाद भी पानी नहीं मिलने की शिकायतें सामने आ रही हैं।
कुछ सर्वेयर दावा करते हैं कि उनके पास जर्मनी की अत्याधुनिक मशीन है, जिसकी कीमत लगभग साढ़े तीन लाख रुपये है। यह मशीन जमीन के अंदर पानी की संभावित स्थिति और चट्टानों की जानकारी देती है। कहीं 300 से 380 मीटर गहराई तक जांच करने की बात कही जाती है, तो कहीं जमीन के भीतर पानी वाले स्थान की पहचान करने का दावा किया जाता है।
लेकिन जब बताए गए स्थान पर बोरिंग कराने के बावजूद पानी नहीं मिलता, तो जवाब होता है—हमारी मशीन पानी मिलने की गारंटी नहीं देती।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि मशीन के परिणाम की विश्वसनीयता और सीमाएं पहले से स्पष्ट नहीं की जातीं, तो ग्राहक से हजारों रुपये किस आधार पर वसूले जा रहे हैं?
इंदौर में सामने आया चौंकाने वाला अनुभव
हाल ही में इंदौर क्षेत्र के एक जमीन मालिक ने भूजल सर्वेक्षण को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, उन्होंने रघुवंशी नामक सर्वेयर के माध्यम से अपनी जमीन का मशीन से भूजल सर्वेक्षण कराया था।
सर्वेयर ने जमीन पर तीन से चार स्थान चिह्नित किए, जहां बोरवेल कराने की सलाह दी गई। जमीन मालिक ने सर्वे के आधार पर बताए गए एक स्थान पर बोरवेल मशीन बुलवाई और खुदाई शुरू कराई।
बोरिंग के दौरान मिट्टी, लाल मिट्टी और कठोर चट्टानें मिलीं। पानी की उम्मीद में खुदाई लगातार जारी रखी गई, लेकिन करीब 550 फीट तक पहुंचने के बावजूद उपयोगी पानी नहीं मिला।
इस पूरी प्रक्रिया में जमीन मालिक के लगभग एक लाख रुपये खर्च हो गए।
अब पीड़ित जमीन मालिक का सवाल है कि जब वैज्ञानिक मशीन से जांच कराई गई थी, तो उसका व्यावहारिक लाभ क्या मिला? यदि पानी मिलने की कोई गारंटी नहीं थी, तो क्या सर्वेयर ने पहले ही स्पष्ट रूप से बताया था कि परिणाम गलत भी हो सकते हैं और ग्राहक को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है?
यह अनुभव भूजल सर्वेक्षण की पारदर्शिता पर सवाल उठाता है। हालांकि केवल बोरवेल में पानी नहीं मिलने से सर्वेयर द्वारा धोखाधड़ी किया जाना साबित नहीं होता। इसकी वास्तविकता जानने के लिए सर्वे रिपोर्ट और तकनीकी दावों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
आधे घंटे का सर्वे, शुल्क हजारों में!
भूजल सर्वेक्षण कराने वालों के अनुसार, अलग-अलग सर्वेयर 5,000 रुपये से लेकर 20,000 रुपये तक शुल्क मांगते हैं। कई स्थानों पर सर्वे की प्रक्रिया आधे घंटे से एक घंटे में पूरी कर दी जाती है।
बड़ा सवाल यह नहीं है कि सर्वे में कितना समय लगा। तकनीकी उपकरण, विशेषज्ञता और यात्रा का भी खर्च होता है। असली सवाल यह है कि इतनी राशि लेने के बाद ग्राहक को वैज्ञानिक आधार वाली कितनी विश्वसनीय जानकारी दी जा रही है।
क्या ग्राहक को मशीन की वास्तविक रीडिंग मिलती है? क्या जमीन के अंदर की संरचना का विश्लेषण दिया जाता है? क्या संभावित जलस्तर और अनुमान की सीमाएं लिखित रूप में बताई जाती हैं? या केवल एक स्थान पर निशान लगाकर बोरिंग करने की सलाह दे दी जाती है?
यदि ग्राहक को वैज्ञानिक रिपोर्ट के बजाय केवल मौखिक अनुमान दिया जाता है, तो इतनी मोटी फीस का औचित्य पूछा जाना चाहिए।
क्या वास्तव में जमीन के नीचे पानी खोज सकती है मशीन?
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भूजल सर्वेक्षण की कई मान्य तकनीकें मौजूद हैं। इनमें इलेक्ट्रिकल रेजिस्टिविटी सर्वे और अन्य भूभौतिकीय विधियां शामिल हैं।
इन तकनीकों से जमीन के नीचे मौजूद विभिन्न परतों, चट्टानों और संभावित जलधारक संरचनाओं के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है।
लेकिन महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अधिकांश भूभौतिकीय मशीनें जमीन के भीतर पानी को किसी कैमरे की तरह सीधे नहीं देखतीं। वे जमीन के भौतिक गुणों का मापन करती हैं, जिनकी व्याख्या विशेषज्ञों द्वारा की जाती है।
एक ही तरह की रीडिंग के पीछे अलग-अलग भूगर्भीय कारण हो सकते हैं। इसलिए केवल मशीन की रीडिंग के आधार पर पानी की निश्चित उपलब्धता या बोरवेल से मिलने वाले पानी की मात्रा की गारंटी देना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।
यानी वैज्ञानिक सर्वेक्षण उपयोगी हो सकता है, लेकिन उसे पानी मिलने की पक्की गारंटी बताना भ्रामक हो सकता है।
जर्मनी की मशीन बताने से क्या विश्वसनीयता साबित हो जाती है?
किसी मशीन का जर्मनी या किसी अन्य देश में निर्मित होना उसकी सटीकता का अपने आप प्रमाण नहीं है।
यदि कोई सर्वेयर दावा करता है कि उसकी मशीन साढ़े तीन लाख रुपये की है और 380 मीटर तक जमीन की जांच कर सकती है, तो उसे मशीन का निर्माता, मॉडल नंबर, तकनीकी क्षमता और जांच पद्धति बतानी चाहिए।
380 मीटर तक जांच करने की क्षमता और उस गहराई पर निश्चित रूप से पानी मिलने की भविष्यवाणी करना दो अलग-अलग बातें हैं।
ग्राहक को यह जानने का अधिकार है कि मशीन वास्तव में क्या माप रही है और सर्वे के निष्कर्ष कितने विश्वसनीय हैं।
किसान और जमीन मालिक आखिर किस पर भरोसा करें?
आज एक बोरवेल कराने में जमीन की प्रकृति और गहराई के अनुसार हजारों से लेकर लाखों रुपये तक खर्च हो सकते हैं।
ऐसे में कोई किसान या जमीन मालिक सर्वेयर की सलाह पर भरोसा करके बोरिंग कराता है और पानी नहीं मिलता, तो उसकी आर्थिक स्थिति पर गंभीर असर पड़ सकता है।
इसलिए भूजल सर्वेक्षण को केवल व्यवसाय के रूप में नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार तकनीकी सेवा के रूप में देखा जाना चाहिए।
सर्वेयर को पहले ही स्पष्ट करना चाहिए कि उसके निष्कर्ष संभावनाओं पर आधारित हैं, उनकी क्या सीमाएं हैं और पानी नहीं मिलने का जोखिम कितना है।
प्रशासन और संबंधित विभागों से पांच महत्वपूर्ण सवाल
1. भूजल सर्वेक्षण के नाम पर सेवाएं देने वाले लोगों की तकनीकी योग्यता और मशीनों के दावों की जांच की क्या व्यवस्था है?
2. क्या सर्वे के बदले ग्राहकों को प्रमाणिक तकनीकी रिपोर्ट दी जा रही है?
3. क्या विदेशी मशीनों और उनकी जांच क्षमता के नाम पर किए जाने वाले विज्ञापनों की सत्यता जांची जाती है?
4. यदि किसी ग्राहक को निश्चित पानी मिलने का भ्रामक आश्वासन दिया गया हो, तो उसके लिए शिकायत और कार्रवाई की क्या प्रक्रिया है?
5. क्या किसानों और जमीन मालिकों को भूजल सर्वेक्षण की वैज्ञानिक सीमाओं के बारे में जागरूक करने की जरूरत नहीं है?
जनता सावधान रहे, केवल मशीन के नाम पर भरोसा न करें
दैनिक रणजीत टाइम्स आम जनता से अपील करता है कि बोरवेल कराने से पहले सर्वेयर की योग्यता, मशीन की तकनीक और रिपोर्ट की विश्वसनीयता अवश्य जांचें।
सर्वेयर से लिखित रिपोर्ट मांगें। आसपास के पुराने बोरवेल, पानी की गहराई और भूगर्भीय स्थिति की जानकारी लें। जहां संभव हो, योग्य भूवैज्ञानिक या मान्यता प्राप्त तकनीकी संस्था से सलाह लें।
यदि कोई व्यक्ति मशीन के नाम पर निश्चित पानी मिलने का दावा करता है, तो उससे लिखित प्रमाण मांगें।
भूजल सर्वेक्षण पर खर्च करना गलत नहीं है, लेकिन बिना वैज्ञानिक प्रमाण के किए गए दावों पर आंख बंद करके भरोसा करना महंगा पड़ सकता है।
रणजीत टाइम्स की मांग: विज्ञान के नाम पर भ्रम फैलाने वालों की हो जांच
भूजल सर्वेक्षण करने वाले सभी लोगों को गलत ठहराना उचित नहीं होगा। अनेक प्रशिक्षित विशेषज्ञ वैज्ञानिक तकनीकों से उपयोगी जानकारी प्रदान करते हैं।
लेकिन यदि कोई व्यक्ति मशीन की क्षमता बढ़ा-चढ़ाकर बताता है, गलत आश्वासन देता है या ग्राहकों से महत्वपूर्ण जानकारी छिपाकर मोटी रकम वसूलता है, तो उसकी जांच और प्रमाण मिलने पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
इंदौर में सामने आए मामले में भी संबंधित सर्वेयर का पक्ष, मशीन का मॉडल, सर्वे रिपोर्ट और भुगतान संबंधी प्रमाणों की जांच जरूरी है।
सवाल किसी एक सर्वेयर का नहीं, बल्कि उन हजारों किसानों और जमीन मालिकों के भरोसे का है, जो जमीन के नीचे पानी की तलाश में अपनी मेहनत की कमाई खर्च करते हैं।
जब वैज्ञानिक तकनीक के नाम पर सर्वे किया जाता है, तो उसकी वैज्ञानिक सीमाएं भी उतनी ही ईमानदारी से बताई जानी चाहिए।
आखिर मशीन की जांच पर भरोसा करके लाखों रुपये खर्च करने वाले आम आदमी के आर्थिक नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा?
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दैनिक रणजीत टाइम्स
जनहित में प्रकाशित विशेष रिपोर्ट
“विज्ञान का उपयोग जनता को सही जानकारी देने के लिए होना चाहिए, झूठी उम्मीद बेचने के लिए नहीं।”

