तीन साल पुराना सरकारी आदेश, अब भी इंतजार में पत्रकार सुरक्षा कानून!
मोहन जी, अब तो अमल कर लो... कहीं ऐसा न हो कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री सिर्फ ANI और PTI तक के ही मुख्यमंत्री रह जाएं
राजेश धाकड़
25 सितंबर 2023 को मध्यप्रदेश शासन के जनसंपर्क विभाग ने बाकायदा आदेश जारी कर पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने के लिए गठित समिति में वरिष्ठ पत्रकार महेश श्रीवास्तव को सदस्य नामांकित किया था। सरकार का आदेश निकला, समिति बनी, बैठक हुई और उसके बाद मामला ऐसा शांत हुआ जैसे पत्रकार सुरक्षा कानून नहीं, किसी सरकारी फाइल को ही सुरक्षा दे दी गई हो। तीन साल गुजर गए, लेकिन पत्रकार आज भी उसी सवाल के साथ खड़ा है आखिर वह कानून आएगा कब, जिसका आदेश सरकार ने खुद जारी किया था?
मोहन यादव जी, यह सवाल किसी विपक्षी दल का नहीं है। यह सवाल आपके ही शासन के उस आदेश का है, जो आज भी दस्तावेज बनकर मौजूद है। आदेश की तारीख साफ है, समिति का गठन साफ है और पत्रकार सुरक्षा कानून का उद्देश्य भी साफ है। अब अगर कुछ साफ नहीं है तो सिर्फ यह कि उस आदेश के बाद आगे क्या हुआ? यही वह सवाल है जिसे अब टालने के बजाय सरकार को सार्वजनिक रूप से जवाब देना चाहिए।
पत्रकार सुरक्षा कानून की जरूरत पर सरकार ने समिति बनाई थी। विधानसभा में भी इस विषय पर सवाल उठ चुका है। सरकार ने बताया कि समिति की बैठक 5 अक्टूबर 2023 को हुई थी और आगे की प्रक्रिया के संबंध में जानकारी एकत्रित की जा रही है। लेकिन पत्रकार के लिए सवाल यह है कि जानकारी आखिर कितने साल तक एकत्रित होती रहेगी?
सरकार जब सड़क बनाती है तो समय सीमा तय होती है। पुल बनाती है तो समय सीमा तय होती है। भवन बनाती है तो समय सीमा तय होती है। योजना लागू करती है तो बजट और समय सीमा तय होती है। फिर पत्रकार सुरक्षा कानून की फाइल के लिए कोई समय सीमा क्यों नहीं?
और यहीं से सवाल थोड़ा कड़वा हो जाता है। मोहन जी, मुख्यमंत्री को सिर्फ वही खबरें नहीं सुननी चाहिए जो ANI और PTI से आती हैं।
उन्हें उस पत्रकार की खबर भी सुननी चाहिए जो गांव में बैठकर सरकारी स्कूल की छत गिरने की खबर करता है। उस रिपोर्टर की आवाज भी सुननी चाहिए जो राशन की दुकान में गरीब का हक मारे जाने पर सवाल उठाता है। उस पत्रकार की आवाज भी सुननी चाहिए जो अस्पताल में डॉक्टर नहीं होने की खबर लिखता है। उस रिपोर्टर की आवाज भी मुख्यमंत्री तक पहुंचनी चाहिए जो किसी प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ दस्तावेज लेकर खड़ा होता है।
क्योंकि लोकतंत्र की असली खबर अक्सर प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं मिलती। वह जमीन पर मिलती है। और जमीन की खबर लिखने वाला पत्रकार अक्सर अकेला होता है।
उसके पास न बड़ा चैनल होता है, न कानूनी टीम, न सुरक्षा का घेरा। उसके पास अगर कुछ होता है तो एक कैमरा, एक कलम और सवाल पूछने की हिम्मत।
इसलिए पत्रकार सुरक्षा कानून केवल पत्रकारों की सुविधा का सवाल नहीं है। यह उस व्यवस्था का सवाल है जिसमें सरकार से सवाल पूछने वाले व्यक्ति को यह भरोसा होना चाहिए कि कानून उसके साथ खड़ा होगा।
सरकार ने समिति बनाई। समिति की बैठक हुई। विधानसभा में सवाल आया। अब जरूरत है कि इस पूरी प्रक्रिया को अगला कदम मिले।
फाइल से बाहर निकलिए साहब, कानून की तरफ बढ़िए क्योंकि आदेशों की उम्र लंबी नहीं होती, लेकिन पत्रकारिता की लड़ाई पीढ़ियों तक चलती है।
आज पत्रकार पूछ रहा है 2023 का आदेश 2026 में कहां खड़ा है? कल जनता पूछेगी सरकार के आदेशों पर अमल कब होगा?
मोहन जी, पत्रकार सरकार का विरोधी नहीं है। लेकिन पत्रकार का काम सरकार की तारीफ करना भी नहीं है। उसका काम है सवाल पूछना। सत्ता से सवाल करना पत्रकारिता का अपराध नहीं, लोकतंत्र की बुनियादी जिम्मेदारी है।
इसलिए इस पुराने आदेश को फिर से निकालिए। समिति को सक्रिय कीजिए। बैठक बुलाइए। जो सुझाव आए हैं उन्हें सार्वजनिक कीजिए और आगे की प्रक्रिया की समय सीमा बताइए।
वरना आने वाले दिनों में पत्रकारों के बीच यह सवाल मजाक बन जाएगा कि मध्यप्रदेश में पत्रकार सुरक्षा कानून की फाइल सुरक्षित है, लेकिन पत्रकार खुद कितने सुरक्षित हैं? और मोहन जी, यही वह सवाल है जिसका जवाब सिर्फ प्रेस नोट से नहीं चलेगा।
अब आदेश पर अमल चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि मुख्यमंत्री पूरे मध्यप्रदेश के हों, लेकिन उनकी सरकार तक पहुंचने वाली पत्रकारिता धीरे-धीरे सिर्फ ANI और PTI की खबरों तक सिमट जाए।

