आज की अशांत दुनिया को चाहिए बुद्ध का 'बीच का रास्ता' (मध्य मार्ग)
( सम्पादकीय - बुद्ध पूर्णिमा पर विशेष )
पत्रकार दिव्यानंद अर्गल
वैशाख महीने की पूर्णिमा हमारे इतिहास का एक बहुत ही खास दिन है। यह सिर्फ एक तारीख नहीं है, बल्कि एक पूरा चक्र है। इसी दिन सिद्धार्थ का जन्म हुआ, इसी दिन बोधगया में एक पेड़ के नीचे उन्हें सच्चा ज्ञान (बुद्धत्व) मिला, और इसी दिन उन्होंने अपना शरीर त्यागा था। जन्म, ज्ञान और मृत्यु—तीनों का एक ही दिन होना बहुत ही अद्भुत है। लेकिन आज जब हम बुद्ध पूर्णिमा मना रहे हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि आज के इस स्मार्टफोन और इंटरनेट वाले जमाने में, जहां हर तरफ भागदौड़ है, बुद्ध के विचार हमारे क्या काम आ सकते हैं?
आज जब हम दुनिया की तरफ देखते हैं, तो हर जगह लड़ाई-झगड़े, नफरत और हिंसा दिखाई देती है। ताकत और हथियारों की होड़ ने इंसान को इंसान का ही दुश्मन बना दिया है। ऐसे मुश्किल समय में बुद्ध की वह बात बहुत याद आती है कि— "नफरत को नफरत से नहीं, बल्कि प्यार से ही खत्म किया जा सकता है।" दुनिया को आज यह समझने की जरूरत है कि सच्ची शांति हथियारों के दम पर नहीं, बल्कि दया और दोस्ती के रास्ते पर चलकर ही मिल सकती है। भारत हमेशा से गर्व के साथ कहता है कि "हमने दुनिया को युद्ध नहीं, बुद्ध दिया है।"
बुद्ध इसलिए महान नहीं हैं कि उन्होंने सिर्फ शांति की बात की, बल्कि उनकी महानता उनकी सोच में है जो पूरी तरह से वैज्ञानिक और काम की है। उन्होंने हमें किसी अंधविश्वास या चमत्कार के भरोसे नहीं छोड़ा। उन्होंने सीधा सा मंत्र दिया— "अपना दीपक खुद बनो।" इसका मतलब है कि अपनी मदद खुद करो। उन्होंने बताया कि हमारे सभी दुखों की असली वजह हमारी कभी खत्म न होने वाली 'इच्छाएं' हैं। और इन दुखों को दूर करने का इलाज भी हमारे ही अंदर है।
आज का इंसान सुख-सुविधाओं के मामले में तो बहुत आगे निकल गया है, लेकिन अंदर से वह उतना ही खाली, तनावग्रस्त और अकेला महसूस करता है। विज्ञापनों और बाजार ने हमारी इच्छाओं को इतना बढ़ा दिया है कि डिप्रेशन और बेचैनी आज की सबसे बड़ी बीमारियां बन गई हैं। ऐसे में बुद्ध का 'मध्य मार्ग' यानी 'बीच का रास्ता' सबसे काम आता है। वे कहते हैं कि न तो बहुत ज्यादा सुख-सुविधाओं के पीछे भागो और न ही अपने शरीर को फालतू के कष्ट दो। जीवन में संतुलन (बैलेंस) बनाकर चलना ही असली खुशी है।
आज के दिन हमें यह सोचना चाहिए कि बुद्ध सिर्फ मंदिरों में पूजा करने के लिए नहीं हैं। उनके विचारों को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में उतारने की जरूरत है। उन्होंने जो अच्छा जीवन जीने के आठ नियम (अष्टांगिक मार्ग) बताए थे— जैसे सही सोचना, सही बोलना, सही काम करना और ईमानदारी से कमाना— ये कोई पूजा-पाठ के नियम नहीं हैं, बल्कि एक अच्छी और खुशहाल जिंदगी जीने की 'गाइडबुक' हैं।
आज अखबार खोलिए तो वो लड़ाई, अपराध और धोखेबाजी की खबरों से भरे मिलते हैं। इन सबके पीछे इंसान का लालच, गुस्सा और मोह (लगाव) है। बुद्ध ने इन्हें 'तीन आग' कहा था। जब तक इंसान के अंदर की ये आग नहीं बुझेगी, तब तक बाहर की दुनिया में शांति नहीं आ सकती।
बुद्ध पूर्णिमा के दिन बुद्ध को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उन्हें सिर्फ भगवान मानकर उनके आगे सिर झुकाने तक सीमित न रहें। बल्कि, उनके बताए हुए दया, समझदारी और अच्छाई के रास्ते पर कम से कम एक कदम तो आगे बढ़ाएं। क्योंकि आज हमारी इस परेशान दुनिया को बुद्ध के प्यार भरे स्पर्श की सबसे ज्यादा जरूरत है।

