तुकईथड़ अतिक्रमण मामला: विभागों की आपसी खींचतान का भू-माफिया उठा रहे फायदा, तहसीलदार कब तय करेंगे जवाबदेही ?
महेन्द्र मालवीय रणजीत टाईम्स
बुरहानपुर (ब्यूरो)। शासन एक तरफ गरीबों को आवास देने के लिए जमीनें आरक्षित कर रहा है, तो दूसरी तरफ बुरहानपुर के खकनार जनपद के ग्राम तुकईथड़ में सरकारी तंत्र की नाक के नीचे बेशकीमती सरकारी जमीन की बंदरबांट चल रही है। अनाज मंडी के पास स्थित जिस गौचर भूमि को साल 2017-18 में आबादी क्षेत्र घोषित कर स्थानीय बेघरों को पट्टे दिए जाने थे, आज उस पर रसूखदार और बाहरी लोग रातों-रात टीन-शेड डालकर पक्का अवैध कब्जा जमा रहे हैं।
हैरानी की बात यह नहीं है कि अतिक्रमण हो रहा है, हैरानी की बात यह है कि इस अवैध खेल को रोकने के बजाय स्थानीय प्रशासन और पंचायत विभाग एक दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे ह
फुटबॉल बनी सरकार की जमीन: पटवारी ने पंचायत पर, पंचायत ने राजस्व पर टाली जिम्मेदारी
जब तुकईथड़ के ग्रामीण इस खुली लूट की शिकायत लेकर पहुंचे, तो उन्हें प्रशासनिक गैर-जिम्मेदारी का लाइव नमूना देखने को मिला।
पटवारी का रटा-रटाया जवाब है: "जमीन आबादी क्षेत्र की है, इसलिए अतिक्रमण हटाना हमारा नहीं, ग्राम पंचायत का काम है।"
पंचायत ने तुरंत पल्ला झाड़ते हुए कहा: "हमारा काम सिर्फ विकास का है, जमीन पर कार्रवाई का अधिकार तो केवल राजस्व विभाग के पास है।"
दो विभागों की इस आपसी खींचतान और 'लेटर-वॉर' को देखकर ऐसा लगता है कि सरकारी जमीन किसी की बपौती नहीं, बल्कि फुटबॉल बन चुकी है, जिसे दोनों विभाग एक-दूसरे के पाले में धकेल रहे हैं। सवाल यह है कि इस प्रशासनिक लाचारी और तालमेल की कमी का खामियाजा गाँव के गरीब क्यों भुगतें ?
क्या मूकदर्शक बने रहेंगे नायब तहसीलदार? जानिए क्या कहता है कानून
जब पटवारी और पंचायत अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे हों, तो ऐसे में पूरे उप-तहसील क्षेत्र के मुखिया यानी नायब तहसीलदार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता के अनुसार, सरकारी जमीन से अवैध कब्जा हटाना और अधीनस्थों पर नियंत्रण रखना सीधे तौर पर तहसीलदार/नायब तहसीलदार के कर्तव्यों में शामिल है। फिर तहसीलदार अंतर्गत पटवारी द्वारा ये कहा जाना कि पंचायत कारवाई करेगी ये समझ से परे।
पंचायत और राजस्व विभाग में समन्वय स्थापित करना
मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता के अनुसार, भले ही जमीन ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले 'आबादी क्षेत्र' की हो, लेकिन उसका मालिकाना हक हमेशा शासन के पास होता है। इसलिए, ऐसी जमीनों से अवैध कब्जा हटाने के लिए तहसीलदार/नायब तहसीलदार के पास व्यापक और असीमित कानूनी अधिकार हैं। फिर भी पटवारी और पंचायत एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टाल रहे हैं, ऐसे में तहसीलदार उप-खंड मजिस्ट्रेट के रूप में दोनों विभागों को संयुक्त निर्देश दे सकता है।
वह ग्राम पंचायत के सचिव/सरपंच को निर्देशित कर सकता है कि पंचायत अतिक्रमणकारियों की सूची और दस्तावेज तैयार करे, जिसे राजस्व अमला वैधानिक रूप से प्रक्रिया करेगा।
जबकि जब पटवारी यह कहता है कि "पंचायत हटाएगी" और पंचायत कहती है "राजस्व हटाएगा", तो यह पूरी तरह से भ्रामक है। ग्राम पंचायत के पास किसी को जेल भेजने, जुर्माना लगाने या बलपूर्वक पक्का अतिक्रमण ढहाने की न्यायिक शक्ति नहीं होती। वह केवल राजस्व विभाग को सहयोग कर सकती है। कार्रवाई करने की अंतिम और वास्तविक शक्ति केवल और केवल तहसीलदार/नायब तहसीलदार के कोर्ट के पास ही है।
वो आबादी घोषित भूमि हैं ओर ग्राम पंचायत ने पट्टे दिए हैं तो वो बताए कि किसको पट्टे दिए है आबादी भूमि की जांच कर पंचायत ही बताएगी ओर मैने पटवारी को को जांच के आदेश दिया है ओर पटवारी ने मुझे लिखित में जांच रिपोर्ट बना कर नहीं दी है ओर पंचायत लिख कर दे की किसको पट्टे नहीं दिए हैं तो कार्यवाही राजस्व करेगी
कविता सोलंकी नायब तहसीलदार

