विजयदशमी आत्मचिंतन का पर्व

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विजयादशमी पर अपने सूक्ष्म शरीर रूपी यंत्र की जागृति करें सहजयोग से 
विजयदशमी एक महत्वपूर्ण हिंदू त्यौहार है जो हर साल अश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था तथा देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त महिषासुर पर विजय प्राप्त की थी। इस दिन लोग न केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाते हैं, बल्कि अपने जीवन में सकारात्मकता और सत्य को अपनाने का संकल्प भी लेते हैं। 
   सभी ईश्वर को मानने वालों के लिए दशहरा, दशमी या विजयादशमी आत्म चिंतन का पर्व है।   यह पर्व हमें सोचने पर विवश करता है कि रावण को आज तक क्यों जलना पड़ रहा है क्या वो इतना शक्तिशाली है कि उसे हर विजयदशमी को जलाने के बाद भी उसके निराकार अस्तित्व का अंत नहीं होता।
    वास्तव में, हमारे अंदर के षडरिपु यानि मन के छ: शत्रु काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, मत्सर्य हैं और यही षडरिपु रावण की मृत्यु का कारण बने। अन्यथा रावण महान शिवभक्त व ज्ञानी था।  पर अपनी भक्ति पर भी रावण को इतना अहंकार था कि स्वयं त्रिलोकीनाथ शिव को उससे पूजा करवाने के लिए प्रतिदिन लंका आना पड़ता था, यह रावण के अहंकार की पराकाष्ठा थी।   एक ओर सुग्रीव हैं जिसने प्रभु श्री राम के चरणों में शीश झुकाया और प्रभु का अनन्य भक्त बन गया।   वहीं दूसरी ओर दसग्रीव वाला (दस गले वाला)  व तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने वाला रावण प्रभु श्री राम का प्यारा नहीं बन पाया क्योंकि वह षडरिपुओं के आधीन‌ था।   
    हर दशमी पर सिर्फ रावण को जलाना उद्देश्य नहीं होता बल्कि यह संकल्प लेने की प्रेरणा भी होती है कि हम अपने अंदर के समस्त अवगुणों का भी दहन करते हैं।  लेकिन प्रश्न है क्या इतना आसान है अपने अवगुणों से पीछा छुड़ाना। बिलकुल... यह बहुत आसान है। 
   सहज योग के माध्यम से हमारे सूक्ष्म शरीर के छ: चक्र  सकारात्मक ऊर्जा से हमारे  अवगुणों को  गुणों में परिवर्तित कर देते हैं। छ: चक्र के छ: गुण हमारे अंदर प्रस्थापित होते हैं और सातवें चक्र पर हम ईश्वरीय साम्राज्य में प्रवेश कर जाते हैं।
   संसार में शांति का साम्राज्य स्थापित हो इसके लिए जरुरी है कि हम अपने दुर्गुणों का अंत करने का संकल्प लें।  तो चलिए सहज योग से जुड़ते हैं।  हम सामान्यतः अपनी आस्थाओं के चलते अपनी रोजी रोटी के माध्यम वाहन, औजार  और उपकरण को भी पूजते हैं, ऐसा करके हम अपने दैनंदिन जीवन में उपयोग में आने वाली वस्तुओं का सम्मान करते हैं,  ईश्वर के चरणों व मित्रों को सोने का पत्ता भेंट कर स्नेह अभिव्यक्त करते हैं।  जब हम इतने‌ भावनात्मक हैं तो अंदर के ईश्वर को समझना भी आवश्यक है क्योंकि प्रकृति का पावनतम रुप हमारे अंदर स्थित है।   प्रकृति के इसी पावनतम स्वरूप से हमारे चक्र निर्मित हैं।  विजयदशमी तन्त्रों के पूजन का भी दिन है तो हमारे अंदर के उपकरण रुपी चक्र को भी पूजना होगा।   आत्मसाक्षात्कार पाना होगा और आत्मचक्षु से अपने अंदर के ईश्वरीय दर्शन का आसास्वादन करना होगा, तभी सही मायने में विजयदशमी मनेगी। 
सहज योग निशुल्क भी है और आसान‌ भी सहजयोग ध्यान केंद्र की जानकारी हेतु टोल फ्री नंबर 1800 2700 800

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