खुशी कहाँ है?

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मैंने सारी दुनिया देखी,
सुख ढूँढने निकला था…
मगर लौटते वक्त
दुख साथ ले आया।

फिर कहीं से एक आवाज़ आई—
“जिस खुशी को तुम बाहर ढूँढ रहे हो,
वो तो तुम्हारे अंदर ही है।”

चीज़ें खुशी नहीं देतीं,
हम चीज़ों से खुशी लेते हैं।
सुकून बाज़ार में नहीं मिलता,
वो तो मन के भीतर खिलता है।

अगर सच में खुश रहना है,
तो बाहर तलाशना छोड़िए…
खुद को जानिए,
खुद के साथ रहिए,
खुद में सम्पूर्ण रहिए।

अपना ख्याल रखिए,
क्योंकि आखिर में समझ आता है—
जिस खुशी को सारी दुनिया में ढूँढा,
वो मेरे अंदर ही थी।

 

कवि गोपाल गावंडे

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