अब भारत के मंदिरों को कौन लूट रहा है? धर्म, धंधा और सरकार के बीच फंसी आस्था
कभी भारत के मंदिरों को लूटने के लिए विदेशी आक्रमणकारी आते थे। इतिहास में हमें बताया गया कि महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, मुगल शासक और अंग्रेज भारत की संपदा पर नजर रखते थे। उस समय लुटेरा पहचान में आ जाता था। उसके हाथ में तलवार होती थी, सेना होती थी और इरादे भी स्पष्ट होते थे।
लेकिन आज भारत स्वतंत्र है, लोकतांत्रिक व्यवस्था है, कानून है, न्यायपालिका है और करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े विशाल मंदिर हैं। फिर भी समय-समय पर मंदिरों के दान, संपत्ति और प्रबंधन को लेकर सवाल उठते रहते हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि आखिर आज मंदिरों को नुकसान पहुंचाने वाला कौन है?
आज कोई सेना लेकर मंदिरों पर हमला नहीं करता। यदि कहीं लूट होती है तो वह फाइलों, खातों, प्रबंधन और अपारदर्शी व्यवस्थाओं के माध्यम से होती है। आम श्रद्धालु अपनी मेहनत की कमाई से दान करता है। वह विश्वास करता है कि उसका योगदान धर्म, सेवा और समाजहित में उपयोग होगा। लेकिन जब दान राशि, आभूषणों या संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर विवाद सामने आते हैं, तब सबसे अधिक आहत वही श्रद्धालु होता है जिसने भगवान के प्रति विश्वास के कारण अपना योगदान दिया था।
विडंबना यह है कि भगवान ने कभी वैभव की मांग नहीं की। भगवान राम ने वनवास का जीवन जिया, भगवान कृष्ण ग्वाल-बालों के बीच रहे और भगवान शिव को वैराग्य का प्रतीक माना जाता है। फिर भी उनके नाम पर अरबों रुपये की संपत्तियां और विशाल व्यवस्थाएं खड़ी हो गईं। कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान पीछे रह गए हैं और उनके नाम पर चलने वाली व्यवस्थाएं आगे निकल गई हैं।
समस्या धर्म में नहीं है, बल्कि धर्म के नाम पर खड़ी होने वाली अपारदर्शी व्यवस्थाओं में है। यदि किसी पंचायत, नगर निगम या सरकारी विभाग के खर्च का हिसाब मांगना लोकतांत्रिक अधिकार है, तो धार्मिक संस्थाओं के करोड़ों-अरबों रुपये के दान का लेखा-जोखा मांगना गलत कैसे हो सकता है?
दुर्भाग्य से हमारे समाज में कई बार प्रबंधन पर सवाल उठाने को धर्म पर हमला मान लिया जाता है। जबकि मंदिर और उसका प्रबंधन दो अलग-अलग विषय हैं। भगवान और उनके नाम पर चल रही संस्था एक नहीं हैं। आस्था का सम्मान करते हुए व्यवस्था से जवाब मांगना लोकतांत्रिक और नैतिक दोनों दृष्टि से उचित है।
आज धर्म और धार्मिक कारोबार के बीच की दूरी भी लगातार कम होती दिखाई देती है। वीआईपी दर्शन, विशेष पूजा, महंगे टिकट और सुविधाओं के नाम पर बढ़ती व्यावसायिकता यह सोचने पर मजबूर करती है कि कहीं भक्त श्रद्धालु से ग्राहक तो नहीं बनता जा रहा।
अंधभक्ति का सबसे बड़ा खतरा यही है कि वह सवाल पूछने की क्षमता को समाप्त कर देती है। इतिहास गवाह है कि जब किसी भी संस्था में जवाबदेही समाप्त होती है, तब भ्रष्टाचार और दुरुपयोग की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। यही सिद्धांत धार्मिक संस्थाओं पर भी लागू होता है।
धर्म का सबसे बड़ा मित्र पारदर्शिता है और सबसे बड़ा शत्रु अपारदर्शिता। जो संस्था ईमानदार है, उसे अपने आय-व्यय का विवरण सार्वजनिक करने में कोई भय नहीं होना चाहिए। मंदिर किसी व्यक्ति या समूह की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की सामूहिक आस्था के केंद्र हैं।
आवश्यकता किसी धर्म के विरोध की नहीं है। आवश्यकता है कि सभी धार्मिक संस्थाओं में पारदर्शी प्रबंधन, स्वतंत्र ऑडिट, सार्वजनिक लेखा-जोखा और जवाबदेही सुनिश्चित हो। इससे धर्म कमजोर नहीं होगा, बल्कि लोगों का विश्वास और मजबूत होगा।
क्योंकि मंदिरों को सबसे बड़ा खतरा आलोचकों से नहीं, बल्कि उन लोगों से होता है जो आस्था को अवसर और श्रद्धा को कारोबार में बदल देते हैं। ऐसे लोग तलवार लेकर नहीं आते, वे धर्म की भाषा बोलते हुए व्यवस्था के भीतर प्रवेश करते हैं। और जब ऐसा होता है तो नुकसान केवल धन का नहीं, बल्कि विश्वास का होता है।
आज प्रश्न इतिहास के आक्रमणकारियों का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या हम अपनी आस्था को इतना जागरूक बना पाए हैं कि धर्म के नाम पर खड़े हर तंत्र से जवाब मांग सकें? यदि नहीं, तो इतिहास और वर्तमान की लूट में अंतर केवल तरीका बदलने का है, पीड़ा का नहीं।

राजेश धाकड़

