बीजेपी और संगठन आमने-सामने — इंदौर की घटना ने खड़े किए कई सवाल
राजेश धाकड़
इंदौर की राजनीति हमेशा से प्रदेश की राजनीति का आईना मानी जाती रही है। यहाँ संगठन की मजबूती, कार्यकर्ताओं की निष्ठा और भाजपा की अनुशासित कार्यशैली की मिसालें दी जाती रही हैं। लेकिन आज जो दृश्य देखने को मिला, उसने राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल केवल एक घटना का नहीं है, सवाल उस विचारधारा, उस संगठनात्मक संस्कृति और उस राजनीतिक चरित्र का है जिसके दम पर भारतीय जनता पार्टी दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा करती है।
क्या वास्तव में आज भाजपा वह भाजपा नहीं रही, जिसे कार्यकर्ता अपनी माँ समान मानते थे? क्या अब संगठन और सत्ता के बीच दूरी बढ़ती जा रही है? क्या कांग्रेस की राजनीति का प्रभाव अब भाजपा की कार्यशैली में भी दिखाई देने लगा है? ये प्रश्न आज आम कार्यकर्ता के मन में उठ रहे हैं।
इंदौर में हुई घटना केवल एक स्थानीय विवाद नहीं है। यह उस अंदरूनी असंतोष की झलक है जो धीरे-धीरे जमीन पर दिखाई देने लगा है। कभी भाजपा में संगठन सर्वोपरि माना जाता था। कार्यकर्ता वर्षों तक बिना किसी पद की अपेक्षा के पार्टी के लिए काम करता था। लेकिन अब परिस्थितियाँ बदलती नजर आ रही हैं। सत्ता के केंद्र में बैठे कुछ नेता और पदाधिकारी शायद जमीन की वास्तविकता से दूर होते जा रहे हैं।
राजनीति में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन जब संगठन और राजनीतिक नेतृत्व आमने-सामने दिखाई देने लगें तो यह केवल एक घटना नहीं रहती, बल्कि यह चेतावनी बन जाती है। भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका अनुशासन और संगठनात्मक समर्पण रहा है। यदि वही कमजोर होने लगे तो चिंता होना स्वाभाविक है।
आज कई पुराने कार्यकर्ता यह कहते दिखाई देते हैं कि पहले भाजपा में विचारधारा के लिए संघर्ष होता था, आज व्यक्तिवाद और गुटबाजी अधिक दिखाई देती है। पहले कार्यकर्ता नेतृत्व तैयार करता था, अब कई जगह नेतृत्व अपने आसपास केवल समर्थकों की भीड़ तैयार करने में लगा है। यही कारण है कि जमीनी कार्यकर्ताओं की पीड़ा अब सार्वजनिक रूप से सामने आने लगी है।
इंदौर की घटना ने यह भी साबित किया है कि सत्ता में लंबे समय तक बने रहने के बाद किसी भी राजनीतिक दल के भीतर आत्ममंथन आवश्यक हो जाता है। यदि समय रहते संवाद नहीं हुआ, यदि कार्यकर्ताओं की भावनाओं को नहीं समझा गया, तो संगठनात्मक असंतोष भविष्य में और बड़ा रूप ले सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा हमेशा कांग्रेस की राजनीति पर परिवारवाद, गुटबाजी और सत्ता केंद्रित कार्यशैली के आरोप लगाती रही है। लेकिन आज जब भाजपा के भीतर भी वैसी ही तस्वीरें दिखाई देने लगें, तो आम जनता सवाल पूछने लगती है कि आखिर दोनों में अंतर क्या रह गया है?
यह समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, बल्कि गंभीर आत्मविश्लेषण का है। गादी पर बैठे राजनेताओं को यह समझना होगा कि राजनीति केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं है। राजनीति विश्वास, संवाद और कार्यकर्ताओं के सम्मान से चलती है। यदि कार्यकर्ता ही उपेक्षित महसूस करने लगे, तो सबसे मजबूत संगठन भी कमजोर पड़ सकता है।
इंदौर की घटना एक संकेत है — संकेत इस बात का कि जमीन पर कुछ बदल रहा है। जरूरत इस बात की है कि नेतृत्व समय रहते इन संकेतों को समझे और संगठन तथा कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ती दूरी को कम करे।
क्योंकि किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत बड़े मंच, बड़े पोस्टर या बड़े भाषण नहीं होते — उसकी असली ताकत वह कार्यकर्ता होता है जो बिना किसी स्वार्थ के पार्टी का झंडा उठाकर सड़क पर खड़ा रहता है।
और यदि वही कार्यकर्ता आज आहत है, तो यह किसी भी राजनीतिक दल के लिए सबसे गंभीर विषय होना चाहिए।

