चट्टान-सा खड़ा हूँ
न सोचा था, न देखा था कभी,
ऐसा भी मोड़ आएगा जीवन के सफर में,
जहाँ अपने ही कदमों की आहट
डराने लगेगी मुझे इस सुनसान डगर में।
दुखों ने ऐसा बसेरा किया,
जैसे मेरा ही घर माँग लिया हो,
हर खुशी दरवाज़े से लौट गई,
और दर्द ने मुझे अपना मान लिया हो।
फिर भी चट्टान-सा खड़ा हूँ राहों में,
टूटा हूँ, मगर बिखरा नहीं हूँ।
जख्म इतने मिले इस सफर में,
कि अब दर्द से भी अनजान नहीं हूँ।
पल-पल तड़पता है इंसान यहाँ,
अपने ही इंसानी पिंजरे में,
चेहरे पर दुनिया के लिए मुस्कान,
और तूफान छिपे हैं सीने में।
कभी लगता है साँसें थम गई हैं,
पर साँसों का आना-जाना बाकी है,
समय जैसे रुक गया हो किसी मोड़ पर,
फिर भी घड़ी की रवानी बाकी है।
बहुत घना अंधेरा छाया है आज,
कि अपना साया भी दिखाई नहीं देता,
जिसे अपना समझकर हाथ बढ़ाऊँ,
वो हाथ भी अब दिखाई नहीं देता।
कितने सवाल दबे हैं मन में,
जिनका कोई जवाब नहीं मिलता,
कितना भी समझाऊँ इस दिल को,
कुछ दर्दों का हिसाब नहीं मिलता।
मैंने देखा है रिश्तों को बदलते,
वक्त के साथ अपनों को दूर जाते,
मैंने देखा है सपनों को टूटते,
और टूटे सपनों को आँखों में चुभ जाते।
कभी मन पूछता है मुझसे—
“और कितना सहना बाकी है?”
मैं चुप होकर आसमान देखता हूँ—
“शायद अभी चलना बाकी है…”
क्योंकि रात चाहे कितनी भी गहरी हो,
सुबह को कब तक रोक पाएगी?
ये जिंदगी चाहे जितना आज़माए मुझे,
एक दिन खुद हार जाएगी।
मैं गिरूँगा तो फिर उठूँगा,
मैं टूटूँगा तो फिर जुड़ूँगा,
आज भले अंधेरों से घिरा हूँ,
कल अपना सूरज खुद ढूँढूँगा।
मैं वही हूँ—
जो दर्द में भी खड़ा रहा,
जिसे वक्त ने हजार बार तोड़ा,
मगर हर बार वह फिर खड़ा हुआ।
न सोचा था, न देखा था कभी,
ऐसा होगा जीवन के सफर में…
मगर अब इतना जान गया हूँ—
अंधेरा चाहे जितना गहरा हो,
मैं खुद को खोने नहीं दूँगा इस सफर में।

कवि — गोपाल गावंडे

