पोहे के बिना मालवा अधूरा है...?

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विशेष लेख | राजेश धाकड़ 
पोहा दिवस पर मालवा की स्वादभरी संस्कृति
हाँ साहब, हम मध्यप्रदेश के मालवांचल के लोग हैं। हमारा जीवन सुबह पोहे से शुरू होता है और यदि उसके साथ जलेबी मिल जाए तो मानो नवग्रह शांत रहते हैं, पितरों का आशीर्वाद बना रहता है और दिनभर किसी से झगड़ा होने की संभावना भी कम हो जाती है। मालवा में पोहा केवल भोजन नहीं है, यह हमारी संस्कृति, परंपरा, पहचान और भावनाओं का अभिन्न हिस्सा है।
दुनिया के लोग सुबह उठकर योग करते हैं, कोई ग्रीन टी पीता है, कोई ओट्स खाता है, कोई कैलोरी गिनता है। लेकिन मालवा का आदमी सुबह उठकर सबसे पहले यह सोचता है कि आज पोहा कहाँ का खाया जाए। घर का पोहा, नुक्कड़ वाले का पोहा या फिर उस प्रसिद्ध दुकान का पोहा जिसके स्वाद की चर्चा शहर की राजनीति से भी अधिक होती है।
मालवा में किसी व्यक्ति का सामाजिक स्तर इस बात से नहीं आँका जाता कि उसके पास कितनी संपत्ति है, बल्कि इस बात से आँका जाता है कि वह किस दुकान का पोहा खाता है। कुछ लोग तो ऐसे गर्व से बताते हैं कि वे अमुक दुकान का पोहा खाते हैं, जैसे कोई विदेशी विश्वविद्यालय से डिग्री लेकर आया हो।
मेरी भी सुबह पोहे के बिना अधूरी रहती है। रोज घर से निकलने से पहले एक प्लेट पोहा खाकर ही बाहर निकलता हूँ। हाँ, एकादशी यानी ग्यारस के दिन यह सुख त्यागना पड़ता है। क्योंकि मेरी माँ का दृढ़ विश्वास है कि ग्यारस पर चावल नहीं खाते और पोहा चावल से बनता है। अब माँ की आस्था के सामने कोई तर्क नहीं चलता। उस दिन मन तो पोहे की दुकान की ओर भागता है लेकिन पैर व्रत और संस्कारों की बेड़ियों में बंधे रहते हैं।
मालवा में पोहे का महत्व इतना अधिक है कि यदि किसी दिन घर में पोहा न बने तो परिवार के सदस्यों को लगता है कि कुछ अशुभ हो गया है। बच्चों को स्कूल भेजने से पहले पोहा, दफ्तर जाने वालों को पोहा, बुजुर्गों को अखबार के साथ पोहा और मेहमानों के स्वागत में भी पोहा। यहाँ तक कि कई बार तो विवाह की प्रारंभिक चर्चा भी पोहे और चाय के साथ ही शुरू होती है।
मुझे तो लगता है कि यदि कभी मालवा में जनगणना हो और प्रश्न पूछा जाए कि आपका धर्म क्या है, तो आधे लोग जवाब दे देंगे — “पोहावादी”। क्योंकि यहाँ पोहे के प्रति जो श्रद्धा है, वह किसी धार्मिक अनुष्ठान से कम नहीं है।
राजनीति भी पोहे से अछूती नहीं है। चुनाव के समय नेता जनता के बीच जाते हैं, लेकिन मालवा में सफल नेता वही माना जाता है जो जनता के साथ खड़े होकर पोहा खा सके। जनता भी नेता को उसके भाषण से कम और पोहे की प्लेट पकड़ने के अंदाज से अधिक परखती है। जिसने पोहे पर नींबू ठीक से नहीं निचोड़ा, उसकी लोकप्रियता पर संदेह हो सकता है।
मालवा के पोहे की विशेषता भी निराली है। ऊपर से बारीक सेव, दानेदार अनार, हरी धनिया, प्याज, नींबू और साथ में जलेबी। यह केवल नाश्ता नहीं, स्वाद का ऐसा लोकतंत्र है जहाँ हर सामग्री को समान सम्मान प्राप्त है। सेव अपने आपको सबसे महत्वपूर्ण समझती है, जलेबी अपनी मिठास पर इतराती है और नींबू सोचता है कि उसके बिना पूरी व्यवस्था फीकी पड़ जाएगी।
आजकल लोग स्वास्थ्य के नाम पर तरह-तरह के विदेशी व्यंजन खा रहे हैं। कोई क्विनोआ खा रहा है, कोई म्यूसली, कोई कॉर्न फ्लेक्स। लेकिन मालवा का आदमी आज भी विश्वास के साथ कहता है कि जितनी आत्मीयता एक प्लेट पोहे में है, उतनी किसी विदेशी नाश्ते में नहीं। क्योंकि पोहा पेट ही नहीं भरता, मन भी भर देता है।
मुझे कभी-कभी लगता है कि यदि पोहा बोल सकता तो वह कहता —
“मालवा वालों, तुमने मुझे भोजन से बढ़कर सम्मान दिया है। मैं तुम्हारी सुबह का हिस्सा हूँ, तुम्हारी यादों का हिस्सा हूँ और तुम्हारी पहचान का हिस्सा हूँ।”
आज जब पोहा दिवस मनाया जा रहा है, तब यह केवल एक व्यंजन का उत्सव नहीं है बल्कि मालवा की उस सांस्कृतिक विरासत का उत्सव है जिसने लोगों को एक सूत्र में बाँध रखा है। पोहे की एक प्लेट के सामने जाति, वर्ग, पद और प्रतिष्ठा के भेद मिट जाते हैं। वहाँ केवल स्वाद होता है, अपनापन होता है और मालवा की मिट्टी की खुशबू होती है।
इसलिए आज के दिन मैं सभी मालवावासियों को पोहा दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ। ईश्वर करे आपकी थाली में पोहा बना रहे, ऊपर सेव की वर्षा होती रहे, जलेबी की मिठास बनी रहे और मालवा की पहचान सदैव इसी तरह महकती रहे।
क्योंकि सच यही है साहब —
पोहे के बिना मालवा अधूरा है, और मालवा के बिना पोहे की कहानी भी अधूरी है।

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