देसी फ्रिज" पर पड़ा आधुनिकता का साया: मटका व्यापार में छाई मायूसी

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शिवपुरी से ऋषि गोस्वामी की रिपोर्ट
​शिवपुरी। तपती गर्मी के बावजूद इस बार मिट्टी के मटकों का बाजार ठंडा नजर आ रहा है। जहाँ एक समय में 'देसी फ्रिज' कहे जाने वाले मटकों की गूंज हर घर में होती थी, वहीं अब बदलते वक्त और घर-घर फ्रिज की उपलब्धता ने इस पारंपरिक व्यापार की कमर तोड़ दी है।
बिक्री में भारी गिरावट: व्यापारियों के अनुसार, पिछले वर्षों की तुलना में इस बार मटकों की बिक्री काफी कम है। दुकानदार दिनेश प्रजापति बताते हैं कि लोगों के पास पहले से ही फ्रिज हैं, जिसके कारण मिट्टी के बर्तनों की मांग में कमी आई है।
बढ़ती लागत: मटका बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री, जैसे मिट्टी और पकाने के लिए 'कंडे', काफी महंगे हो गए हैं। जहाँ पहले कच्चा माल आसानी से मिल जाता था, अब उसे दूर-दराज के इलाकों जैसे झांसी या पिछोर से मंगवाना पड़ता है।
मेले में भी मायूसी: ऐतिहासिक राजेश्वरी माता मेले के दौरान भी व्यापारियों को वैसी सफलता नहीं मिली जैसी उम्मीद थी। स्टॉक भरा पड़ा है, लेकिन खरीदार कम हैं।
तकनीक का बदलाव: अब मटके पारंपरिक चाक के बजाय बिजली की मशीनों से बनाए जा रहे हैं, लेकिन लागत और मेहनत के बावजूद ग्राहकों की मोलभाव करने की आदत ने मुनाफे को नगण्य कर दिया है।
क्यों है 'झांसी की मटकी' खास?
​दुकानदारों का दावा है कि झांसी से आने वाली 'रेतीली मिट्टी' की मटकियाँ पानी को सबसे ज्यादा ठंडा रखती हैं। इन मटकों की कीमत 100 से 150 के बीच है, फिर भी लोग इसे महंगा बताकर दूरी बना रहे हैं।
​"पहले की तुलना में अब धंधा बहुत ढीला है। हर घर में फ्रिज होने से मटके की कद्र कम हो गई है, ऊपर से लागत दोगुनी हो गई है।"

- दिनेश प्रजापति, मटका व्यापारी

हमारा नजरिया: क्या हम अपनी सेहत और परंपरा को आधुनिकता के चक्कर में भूलते जा रहे हैं? मिट्टी के पानी का स्वाद और ठंडक न केवल प्यास बुझाती है बल्कि सेहत के लिए भी लाभकारी है। मटका व्यापारियों की यह स्थिति एक गंभीर चिंता का विषय है।

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