आत्मसम्मान, सहजयोग के मार्ग पर आत्मबोध की पहली सीढ़ी
मानव जीवन में अनेक सद्गुणों का महत्व है, लेकिन आत्मसम्मान ऐसा गुण है जो व्यक्ति के आंतरिक विकास, व्यक्तित्व की गरिमा और आध्यात्मिक उन्नति का मजबूत आधार बनता है। प.पू. श्री माताजी निर्मला देवी ने 27 मई 1989 के अपने संदेश में आत्मसम्मान के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा था कि “आत्मसम्मान सहजयोग की पहली सीढ़ी है।”
आत्मसम्मान को अक्सर अहंकार के साथ जोड़ दिया जाता है, जबकि दोनों में मूलभूत अंतर है। अहंकार व्यक्ति को स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने की ओर ले जाता है, वहीं आत्मसम्मान व्यक्ति को अपने भीतर स्थित दिव्यता, पवित्रता और आत्मिक मूल्य का बोध कराता है। आत्मसम्मान से युक्त व्यक्ति को अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए किसी से प्रतिस्पर्धा करने की आवश्यकता महसूस नहीं होती।
आज के जीवन में छोटी-छोटी बातों को लेकर विवाद, बहस और कटुता बढ़ती दिखाई देती है। अनेक बार व्यक्ति दूसरों की बातों या व्यवहार पर तुरंत प्रतिक्रिया करता है और अपनी मानसिक शांति खो देता है। ऐसे समय में आत्मसम्मान और विवेक व्यक्ति को यह समझने की शक्ति देते हैं कि प्रत्येक बात का उत्तर देना आवश्यक नहीं है। समझदार व्यक्ति पहले यह देखता है कि किसी विषय पर विवाद करना वास्तव में उचित और आवश्यक है या नहीं।
जिस व्यक्ति को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होता है, वह अपनी ऊर्जा को निरर्थक तर्क-वितर्क और संघर्ष में व्यर्थ नहीं करता। वह अपने समय और शक्ति का उपयोग आत्मविकास, अपने दायित्वों और आध्यात्मिक उन्नति के लिए करता है। आत्मसम्मान व्यक्ति को भीतर से स्थिर बनाता है और परिस्थितियों के बीच संतुलित रहने की क्षमता प्रदान करता है।
हालाँकि आत्मसम्मान का अर्थ निष्क्रिय रहना या अन्याय को सहन करना भी नहीं है। जब सत्य और धर्म की रक्षा का प्रश्न सामने आता है, तब आत्मसम्मान व्यक्ति में साहस और दृढ़ता उत्पन्न करता है। वह बिना क्रोध, द्वेष या आक्रामकता के सत्य के पक्ष में खड़ा होता है। उसकी शक्ति किसी व्यक्ति का विरोध करने में नहीं, बल्कि सत्य के प्रति उसकी निष्ठा में होती है।
सहजयोग की साधना व्यक्ति को अपने भीतर स्थित आत्मा के प्रकाश से जोड़ने का मार्ग प्रदान करती है। आत्मबोध के इस अनुभव से व्यक्ति को अपने वास्तविक मूल्य व आंतरिक गरिमा का अनुभव होने लगता है। धीरे-धीरे उसके व्यवहार में शांति, संतुलन, विवेक और आत्मविश्वास दिखने लगता है। आत्मसम्मान से परिपूर्ण व्यक्ति दूसरों का सम्मान करना भी सीखता है। वह न तो किसी को अनावश्यक रूप से अपमानित करता है और न ही अपने आत्मिक गौरव को ठेस पहुँचाने वाले व्यवहार को सहजता से स्वीकार करता है। उसके संबंधों में प्रेम और करुणा होती है तथा उसके निर्णयों में विवेक और संतुलन दिखाई देता है।
प.पू. श्री माताजी का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। आधुनिक जीवन की व्यस्तता, प्रतिस्पर्धा और तनाव के बीच यदि व्यक्ति अपने भीतर के आत्मसम्मान से जुड़ा रहे, तो वह बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित हुए बिना अपने जीवन को अधिक गरिमापूर्ण और संतुलित बना सकता है।
सहजयोग हमें यह समझने की प्रेरणा देता है कि सच्चा सम्मान बाहर से प्राप्त होने वाली प्रशंसा में नहीं, बल्कि अपने भीतर की आत्मिक शक्ति को पहचानने में है। जब आत्मसम्मान हमारे विचारों, वाणी और कर्मों का आधार बन जाता है, तब जीवन में एक स्वाभाविक गरिमा और शांति का विकास होता है। इसलिए प्रत्येक साधक के लिए आवश्यक है कि वह अपने भीतर आत्मसम्मान को जागृत करे, उसे निरंतर विकसित करे और सत्य, प्रेम, करुणा तथा धर्म के मार्ग पर चलते हुए अपने आचरण में उतारे। आत्मसम्मान व्यक्ति को केवल बेहतर मनुष्य ही नहीं बनाता, बल्कि उसे अपने आध्यात्मिक स्वरूप की ओर आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देता है।
“हमें आत्मसम्मान को अपने अंतःकरण में विकसित करना है, और इसे अपने आचरण में अभिव्यक्त करना है।”
— प.पू. श्री माताजी निर्मला देवी
सहजयोग के बारे में अधिक जानकारी टोल-फ्री नंबर 1800-270-08 या www.sahajayoga.org.in पर प्राप्त करें। सहजयोग पूर्णतः निःशुल्क है।

