मध्यप्रदेश में हज़ारों बच्चों को ढंग से भोजन नहीं मिल पा रहा और सरकार योग में व्यस्त...?
राजेश धाकड़
मध्यप्रदेश बड़ा ही अद्भुत प्रदेश है। यहां समस्याएं भी सरकारी प्रेस नोट देखकर आती हैं और समाधान भी कैमरे की फ्लैश देखकर पैदा होते हैं। प्रदेश में अगर कोई बच्चा कुपोषण का शिकार हो जाए तो यह चिंता का विषय कम और आंकड़ों का विषय ज्यादा बन जाता है। लेकिन यदि योग दिवस का आयोजन हो तो पूरा सरकारी अमला ऐसे सक्रिय हो जाता है जैसे प्रदेश की सारी समस्याओं का समाधान आज ही होने वाला हो।
21 जून को सुबह-सुबह मंत्री, विधायक, सांसद, कलेक्टर, कमिश्नर, एसपी और विभागों के कर्मचारी योगा मैट लेकर मैदान में पहुंच जाते हैं। कैमरे लगते हैं, ड्रोन उड़ते हैं, सोशल मीडिया टीम सक्रिय होती है और फिर शुरू होता है स्वस्थ मध्यप्रदेश का महाअभियान। दूसरी तरफ उसी प्रदेश के किसी गांव में कोई बच्चा आंगनवाड़ी में मिलने वाले भोजन का इंतजार कर रहा होता है। कोई मां अपने कुपोषित बच्चे को गोद में लेकर अस्पताल की लाइन में खड़ी होती है और कोई परिवार दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहा होता है।
मध्यप्रदेश का इतिहास बड़ा विचित्र रहा है। कभी यह बीमारू राज्यों की सूची में गिना जाता था। फिर विकास की ऐसी गंगा बही कि सरकारी विज्ञापनों में प्रदेश स्वर्ग बन गया। लेकिन जब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टें सामने आती हैं तो पता चलता है कि कुपोषण, मातृ मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर, महिला अपराध और शिक्षा जैसी अनेक चुनौतियां आज भी प्रदेश के सामने मुंह बाए खड़ी हैं।
सरकार कहती है कि योग स्वास्थ्य का आधार है। बात बिल्कुल सही है। योग शरीर और मन दोनों को स्वस्थ रखता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या भूखे पेट योग संभव है? जिस बच्चे के शरीर में पोषण की कमी हो, जिसकी हड्डियां कमजोर हों, जिसकी आंखों में चमक के स्थान पर कुपोषण की पीड़ा हो, वह सूर्य नमस्कार करेगा या भोजन की तलाश करेगा?
लगता है प्रदेश में अब एक नया सिद्धांत लागू हो गया है“पहले योग, बाद में भोजन।” यदि यही चलता रहा तो आने वाले समय में आंगनवाड़ी केंद्रों पर बच्चों को खिचड़ी और दाल की जगह योगासन सिखाए जाएंगे। राशन की दुकानों पर गेहूं और चावल की जगह प्राणायाम की पुस्तकें बांटी जाएंगी। और यदि किसी गरीब ने भोजन की मांग कर दी तो उसे सलाह दी जाएगी कि अनुलोम-विलोम करने से भूख पर नियंत्रण पाया जा सकता है। लेकिन प्रदेश की वास्तविकताएं इससे भी अधिक कठोर हैं।
प्रदेश में अनेक क्षेत्रों में आज भी स्वच्छ पेयजल की समस्या बनी हुई है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। शिक्षा व्यवस्था में भी अनेक चुनौतियां हैं। सरकारी स्कूलों में सुविधाओं की कमी, शिक्षकों के रिक्त पद और संसाधनों का अभाव लगातार चर्चा का विषय बने रहते हैं। लेकिन इन सबके बीच सबसे ज्यादा जरूरी यह साबित करना हो गया है कि योग दिवस का आयोजन ऐतिहासिक रहा।
सरकारी मशीनरी का एक बड़ा हिस्सा कई दिनों तक आयोजन की तैयारियों में लगा रहता है। मैदान सजते हैं, मंच बनते हैं, बैनर लगते हैं और फिर हजारों लोगों की उपस्थिति का दावा किया जाता है। अगले दिन अखबारों में तस्वीरें छपती हैं और अधिकारियों को बधाई मिलती है। मगर किसी अखबार के कोने में छपी वह खबर शायद ही किसी का ध्यान खींच पाती है जिसमें किसी कुपोषित बच्चे की मौत, किसी महिला के साथ अपराध या किसी ग्रामीण क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं के अभाव की बात होती है।
मध्यप्रदेश में महिला अपराधों के आंकड़े भी लंबे समय से चिंता का विषय बने हुए हैं। हर वर्ष हजारों मामले दर्ज होते हैं। कई बार सरकार और प्रशासन कठोर कार्रवाई का दावा करते हैं, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि समस्या अभी भी गंभीर है। यही स्थिति बच्चों की सुरक्षा और लापता बच्चों के मामलों में भी दिखाई देती है। मगर इन मुद्दों पर उतनी ऊर्जा दिखाई नहीं देती जितनी किसी सरकारी आयोजन की सफलता साबित करने में लगाई जाती है।
प्रदेश की राजनीति भी कम दिलचस्प नहीं है। सत्ता पक्ष उपलब्धियों के गीत गाता है और विपक्ष विफलताओं की सूची पढ़ता है। जनता दोनों को सुनती है और फिर अपने जीवन की वास्तविकताओं में लौट जाती है। उसे न तो बड़े-बड़े दावों से पेट भरता है और न ही राजनीतिक भाषणों से जीवन आसान होता है। उसे चाहिए रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा। लेकिन इन विषयों पर काम करने की तुलना में कार्यक्रम आयोजित करना शायद अधिक आसान है।
आज यदि किसी गांव में जाकर पूछा जाए कि सबसे बड़ी जरूरत क्या है, तो शायद जवाब होगा रोजगार, सिंचाई, अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन। कोई यह नहीं कहेगा कि हमें एक और योग समारोह चाहिए। क्योंकि जनता जानती है कि योग स्वास्थ्य का साधन हो सकता है, लेकिन भूख का समाधान नहीं।
योग का महत्व अपनी जगह है। भारतीय संस्कृति ने पूरी दुनिया को योग का उपहार दिया है और इस पर गर्व होना चाहिए। लेकिन किसी भी सरकार की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना होनी चाहिए कि प्रदेश का कोई बच्चा भूखा न सोए, कोई महिला असुरक्षित महसूस न करे, कोई किसान निराश होकर आत्महत्या न करे और कोई युवा बेरोजगारी से टूट न जाए।
जब तक ये मूलभूत प्रश्न अनुत्तरित रहेंगे, तब तक केवल आयोजनों और उत्सवों से विकास की तस्वीर पूरी नहीं होगी।
आखिर में एक काल्पनिक दृश्य की कल्पना कीजिए।
एक कुपोषित बच्चा सरकार से पूछता है
“साहब, मुझे भोजन कब मिलेगा?”
साहब मुस्कुराते हुए कहते हैं
“बेटा, पहले योग करो।”
बच्चा फिर पूछता है
“लेकिन भूख लगी है।”
साहब जवाब देते हैं
“प्रदेश स्वस्थ बन रहा है, तुम भी स्वस्थ रहो।”
बच्चा चुप हो जाता है। क्योंकि उसे समझ आ जाता है कि इस प्रदेश में कभी-कभी रोटी से ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी तस्वीर होती है, और उसकी समस्या से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका इस्तेमाल किसी कार्यक्रम की भीड़ बढ़ाने में।
योग कीजिए, अवश्य कीजिए, लेकिन उससे पहले यह भी सुनिश्चित कीजिए कि प्रदेश का कोई बच्चा भूख, कुपोषण और उपेक्षा का शिकार न हो। क्योंकि स्वस्थ समाज की शुरुआत योगासन से नहीं, बल्कि हर बच्चे की थाली में सम्मानजनक भोजन से होती है।

