नौकरी के लिए हजारों दावेदार, जनप्रतिनिधि बनने के लिए इतने कम क्यों?
लोकतंत्र में हम मतदाता बनने को तैयार हैं, उम्मीदवार बनने से क्यों हिचकते हैं?
सरकारी नौकरी की एक छोटी-सी रिक्ति निकलती है तो उसके लिए बड़ी संख्या में आवेदन पहुंच जाते हैं। युवा महीनों तैयारी करते हैं, परीक्षाएं देते हैं, साक्षात्कार की कतार में खड़े होते हैं। उन्हें विश्वास होता है कि वे उस पद के योग्य हैं और अवसर मिला तो जिम्मेदारी निभा सकते हैं।
इसके ठीक उलट चुनाव का दृश्य देखिए। लाखों की आबादी वाले विधानसभा क्षेत्र में उम्मीदवारों की संख्या अक्सर उंगलियों पर गिनी जा सकती है। पंचायत, नगर निकाय से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक यही सवाल हमारे सामने खड़ा होता है—जब नौकरी के एक पद के लिए हजारों लोग स्वयं को योग्य मानते हैं, तो लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व करने के लिए इतने कम नागरिक आगे क्यों आते हैं?
यह प्रश्न चुनाव लड़ने वालों की संख्या से कहीं बड़ा है। यह हमारी लोकतांत्रिक सोच और राजनीतिक भागीदारी से जुड़ा प्रश्न है।
राजनीति आखिर किसकी है?
हमने राजनीति को धीरे-धीरे एक अलग पेशा मान लिया है। आम धारणा बन गई है कि चुनाव वही लड़ सकता है जिसके पास राजनीतिक परिवार की विरासत हो, बड़ा संगठन हो, पर्याप्त पैसा हो या किसी प्रभावशाली दल का समर्थन हो।
इसी धारणा के कारण एक शिक्षक, डॉक्टर, वकील, किसान, व्यापारी, इंजीनियर, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता या सामान्य युवा स्वयं को जनप्रतिनिधि के रूप में देखने की कल्पना तक नहीं करता।
जबकि लोकतंत्र का मूल विचार ही यह है कि शासन में जनता की भागीदारी हो। निर्धारित कानूनी योग्यताएं पूरी करने वाला नागरिक चुनावी प्रक्रिया में उम्मीदवार के रूप में भाग ले सकता है।
फिर राजनीति को हमने कुछ लोगों तक सीमित क्षेत्र क्यों मान लिया?
आलोचना में आगे, भागीदारी में पीछे
आज सोशल मीडिया ने लगभग हर नागरिक को अपनी बात रखने का मंच दिया है। सड़क खराब हो तो पोस्ट होती है। पानी नहीं आए तो सरकार से सवाल होता है। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार और विकास पर प्रतिदिन हजारों सुझाव दिए जाते हैं।
यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है। सत्ता से सवाल होना चाहिए।
लेकिन इसके साथ एक दूसरा सवाल भी जरूरी है—यदि हमारे पास समस्याओं की इतनी स्पष्ट समझ और समाधान के इतने सुझाव हैं, तो हममें से अधिक लोग सार्वजनिक जीवन में उतरने के बारे में क्यों नहीं सोचते?
व्यवस्था को यह बताना कि उसे क्या करना चाहिए, नागरिक का अधिकार है। लेकिन जो व्यक्ति स्वयं को सक्षम समझता है, उसके लिए व्यवस्था का हिस्सा बनकर बदलाव का प्रयास करने का रास्ता भी खुला है।
क्या राजनीति की नकारात्मक छवि जिम्मेदार है?
संभवतः सबसे बड़ी बाधाओं में से एक राजनीति को लेकर हमारे मन में बनी छवि है। राजनीति का नाम आते ही धनबल, बाहुबल, भ्रष्टाचार, गुटबाजी और सत्ता संघर्ष जैसे शब्द सामने आने लगते हैं।
इस छवि के पीछे वास्तविक अनुभव और कारण हो सकते हैं। लेकिन इसका परिणाम चिंताजनक है। अच्छे, शिक्षित, ईमानदार और सक्षम नागरिक यदि यह सोचकर राजनीति से दूर रहें कि यह क्षेत्र उनके लिए नहीं है, तो राजनीति की गुणवत्ता बेहतर कैसे होगी?
यदि अच्छे लोग राजनीति से दूरी बनाएंगे, तो अच्छी राजनीति की अपेक्षा किससे करेंगे?
राजनीति की कमियों की आलोचना आवश्यक है, लेकिन राजनीति से अच्छे लोगों का पलायन उसका समाधान नहीं हो सकता।
जनप्रतिनिधि का अर्थ सत्ता नहीं, जिम्मेदारी है
हमारी दूसरी समस्या शायद 'नेता' शब्द को देखने के तरीके में है।
नेता का अर्थ केवल पद, प्रभाव, काफिला या सत्ता नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित व्यक्ति मूलतः जनप्रतिनिधि है—जनता की समस्याओं, आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को शासन तक पहुंचाने वाला प्रतिनिधि।
इसलिए चुनाव लड़ना केवल सत्ता प्राप्त करने की महत्वाकांक्षा नहीं होना चाहिए। इसे सार्वजनिक जिम्मेदारी लेने की इच्छा के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
हर व्यक्ति को चुनाव लड़ना चाहिए, यह तर्क व्यावहारिक नहीं है। हर व्यक्ति में इसकी इच्छा या क्षमता होना भी आवश्यक नहीं। लेकिन योग्य नागरिक केवल इसलिए पीछे हट जाएं कि उन्होंने राजनीति को अपने लिए निषिद्ध क्षेत्र मान लिया है, यह लोकतंत्र के लिए स्वस्थ स्थिति नहीं है।
युवाओं को राजनीतिक साक्षरता भी चाहिए
हम युवाओं को नौकरी की परीक्षा का पाठ्यक्रम बताते हैं। उन्हें आवेदन भरना सिखाते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं और करियर के विकल्पों की जानकारी देते हैं।
क्या उतनी ही गंभीरता से उन्हें लोकतांत्रिक संस्थाओं के बारे में बताते हैं?
कितने युवाओं को मालूम है कि पार्षद की वास्तविक जिम्मेदारी क्या है? पंचायत के अधिकार क्या हैं? विधायक और सांसद की भूमिका में क्या अंतर है? चुनाव लड़ने के लिए क्या कानूनी योग्यताएं और प्रक्रियाएं हैं?
राजनीतिक जागरूकता का अर्थ किसी पार्टी का समर्थक बनना नहीं है। इसका अर्थ है—अपने लोकतंत्र को समझना और उसमें अपनी भूमिका पहचानना।
कभी यह सवाल भी पूछिए—‘मैं क्यों नहीं?’
चुनाव के समय हम उम्मीदवारों को देखते हैं और पूछते हैं—इनमें सबसे अच्छा कौन है?
लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए शायद एक और सवाल पूछने का समय है—
“यदि मुझे लगता है कि मेरे क्षेत्र का बेहतर प्रतिनिधित्व हो सकता है, तो मैं क्यों नहीं?”
इस सवाल का अर्थ यह नहीं कि हर नागरिक अगला चुनाव लड़ने निकल पड़े। इसका अर्थ केवल इतना है कि राजनीति को कुछ परिवारों, दलों या स्थापित चेहरों की जागीर मानने की मानसिकता टूटनी चाहिए।
देश को अच्छे मतदाताओं की आवश्यकता है, लेकिन उतनी ही आवश्यकता अच्छे उम्मीदवारों की भी है।
हम सोशल मीडिया पर परिवर्तन की मांग करते हैं। सरकारों को सुझाव देते हैं। नेताओं से बेहतर काम की अपेक्षा करते हैं। यह सब जरूरी है। लेकिन लोकतंत्र हमें आलोचना के साथ भागीदारी का अवसर भी देता है।
नौकरी के एक पद के लिए हजारों लोग स्वयं को दावेदार मानते हैं। फिर जनसेवा की जिम्मेदारी के लिए स्वयं को योग्य मानने वाले नागरिक इतने कम क्यों दिखाई देते हैं?
यह सवाल किसी एक चुनाव या राजनीतिक दल से नहीं है।
यह सवाल हम सब से है।

— गोपाल गावंडे

