गारंटी किस बात की?
हम हर चीज़ की गारंटी पूछते हैं,
दुकान पर जाते ही पहला सवाल करते हैं—
“ये कितने साल चलेगा?”
“इसकी वारंटी कितनी है?”
“खराब हुआ तो कौन जिम्मेदार होगा?”
पंखा खरीदें तो गारंटी,
टीवी खरीदें तो वारंटी,
गाड़ी लें तो सर्विस की चिंता,
मोबाइल लें तो उसकी उम्र पूछते हैं।
कुछ हजार की चीज़ खरीदने से पहले भी
दस बार सोचते हैं—
“आखिर ये चलेगी कब तक?”
लेकिन कितनी अजीब बात है…
जिस जिंदगी से
हम ये सारी चीज़ें खरीद रहे हैं,
उस जिंदगी की कोई गारंटी नहीं।
जो हाथ आज सामान खरीद रहे हैं,
कल वही हाथ रहें—गारंटी नहीं।
जिस घर को सजाने में उम्र लगा रहे हैं,
उस घर में हम कब तक रहें—गारंटी नहीं।
जिन लोगों से आज नाराज़ बैठे हैं,
कल उन्हें मनाने का मौका मिले—गारंटी नहीं।
हम बैंक बैलेंस बढ़ाते रहे,
मकान बड़े बनाते रहे,
नई गाड़ियाँ खरीदते रहे,
भविष्य सुरक्षित करते रहे…
और जिंदगी?
वह चुपचाप
हमारी मुट्ठी से रेत की तरह
हर दिन फिसलती रही।
हम कल के लिए
आज की खुशियाँ टालते रहे—
“अगले महीने घूमने जाएंगे…”
“अगली बार परिवार के साथ बैठेंगे…”
“फुर्सत मिली तो दोस्तों से मिलेंगे…”
“एक दिन आराम से जिंदगी जिएंगे…”
लेकिन उस “एक दिन” के आने की
गारंटी कौन देगा?
घड़ी की गारंटी मिल सकती है,
लेकिन उसमें चल रहे समय की नहीं।
गाड़ी की वारंटी मिल सकती है,
लेकिन उसमें बैठे इंसान की नहीं।
घर की मजबूती की गारंटी मिल सकती है,
लेकिन उसमें रहने वाले रिश्तों की नहीं।
इसलिए…
सामान की गारंटी जरूर लेना,
लेकिन जिंदगी को वारंटी के भरोसे मत छोड़ना।
जो अपने हैं, उन्हें आज ही गले लगा लेना,
जिससे नाराज़ हो, उसे आज ही मना लेना,
माँ-बाप के पास कुछ देर बैठ लेना,
बच्चों के साथ थोड़ा हँस लेना,
पुराने दोस्त को फोन कर लेना,
और जो सपना दिल में है—
उसे जीने की शुरुआत कर देना।
क्योंकि
सामान खराब हो जाए तो बदला जा सकता है,
पैसा चला जाए तो दोबारा कमाया जा सकता है,
लेकिन बीता हुआ एक पल…
दुनिया की किसी दुकान में वापस नहीं मिलता।
हम पूरी जिंदगी
चीज़ों की गारंटी ढूँढते रह जाते हैं,
और भूल जाते हैं कि
जिस जिंदगी के लिए ये सारी चीज़ें हैं—
उस जिंदगी की तो अगले पल की भी गारंटी नहीं।
इसलिए जिंदगी को संभालकर नहीं…
दिल खोलकर जियो।
क्योंकि “कल” एक उम्मीद है,
गारंटी नहीं।

— गोपाल गावंडे

