मरने के बाद क्या कहेंगे लोग?

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— गोपाल गावंडे

मरने के बाद क्या कहेंगे लोग?
बस यही सोचते-सोचते
कितने लोग जीना भूल गए...

कपड़े पहनने से पहले सोचा—
लोग क्या कहेंगे?
घर बनाने से पहले सोचा—
लोग क्या कहेंगे?
बच्चों के फैसलों में सोचा—
लोग क्या कहेंगे?
हँसने से पहले, रोने से पहले,
अपने मन की करने से पहले भी—
लोग क्या कहेंगे?

और एक दिन...
जिंदगी खत्म हो गई,
मगर लोगों का कहना खत्म नहीं हुआ।

तुम्हारे जाने के बाद
कोई कहेगा—बहुत अच्छा आदमी था,
कोई कहेगा—थोड़ा गुस्से वाला था,
कोई तुम्हारी अच्छाइयाँ गिनाएगा,
कोई तुम्हारी गलतियाँ।

कुछ लोग आँसू बहाएँगे,
कुछ तस्वीर पर फूल चढ़ाएँगे,
और कुछ शायद उसी दिन
अपने काम में लग जाएँगे।

फिर अगली सुबह सूरज निकलेगा,
दुकानें खुलेंगी,
फोन बजेंगे,
बाजार चलेगा,
लोग हँसेंगे, खाना खाएँगे,
अपनी-अपनी दौड़ में निकल जाएँगे...

दुनिया तुम्हारे बिना भी चलती रहेगी।

धीरे-धीरे तुम्हारी तस्वीर पर
चढ़े फूल सूख जाएँगे,
तुम्हारा कमरा किसी और काम आएगा,
तुम्हारी कुर्सी पर कोई और बैठेगा,
तुम्हारे कपड़े अलमारी से निकलेंगे,
और तुम्हारी बनाई हुई चीजों पर
किसी और का अधिकार होगा।

जिस प्रॉपर्टी के लिए
तुमने रातों की नींद खोई,
जिस पैसे के लिए
अपनों को समय नहीं दिया,
जिस नाम के लिए
पूरी उम्र भागते रहे—

एक दिन वही सब यहीं होगा...
बस तुम नहीं होगे।

फिर किस बात का इतना घमंड?
किस बात की इतनी नाराज़गी?
किससे इतनी दुश्मनी?
और किसे दिखाने के लिए
इतनी बड़ी जिंदगी की दौड़?

यहाँ तो तारीख बदलते ही
लोगों की प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं,
वक्त बदलते ही रिश्ते बदल जाते हैं,
जरूरत खत्म होते ही
फोन आना बंद हो जाते हैं।

जिन्हें लगता है कि
दुनिया उन्हें हमेशा याद रखेगी,
वे बस इतना याद रखें—

यहाँ लोग जरूरत पड़ने पर भगवान को याद करते हैं,
तो इंसान की क्या बिसात है?

तुम्हारी संपत्ति की जरूरत होगी,
तो तुम्हारा नाम लिया जाएगा।
तुम्हारे संपर्क की जरूरत होगी,
तो तुम्हारी बातें होंगी।
तुमसे कोई फायदा जुड़ा होगा,
तो शायद तुम्हारी तस्वीर भी संभालकर रखी जाएगी।

लेकिन बिना मतलब के
कौन किसे कब तक याद रखता है?

इसलिए
मरने के बाद लोग क्या कहेंगे,
यह सोचना छोड़ दो।

यह सोचो—

जब तक जिंदा हो,
तब तक तुम्हारा दिल क्या कह रहा है?

माँ-बाप पास हैं तो बैठ लो,
बच्चे छोटे हैं तो उनके साथ खेल लो,
जीवनसाथी साथ है तो दो बातें कर लो,
पुराना दोस्त याद आए तो फोन कर लो,
किसी से नाराज़ हो तो माफ कर दो,
किसी से प्यार है तो आज ही बता दो।

क्योंकि कब तस्वीर खिंचते-खिंचते
तस्वीर पर माला चढ़ जाए,
किसे पता?

आखिर में
न बैंक बैलेंस साथ जाएगा,
न जमीन, न मकान,
न पद, न प्रतिष्ठा,
न वह भीड़
जिसे खुश करने में तुमने
अपनी पूरी जिंदगी लगा दी।

साथ जाएगी तो शायद
बस इतनी-सी तसल्ली—

मैंने जिंदगी काटी नहीं थी,
मैंने जिंदगी जी थी।

इसलिए जी लो...

लोगों के लिए नहीं,
दिखावे के लिए नहीं,
मरने के बाद मिलने वाली तारीफ के लिए नहीं—

अपने लोगों के साथ,
अपने मन के साथ,
आज के इस पल के साथ।

क्योंकि सबसे बड़ा रोग
सिर्फ यह नहीं कि—
“लोग क्या कहेंगे?”

सबसे बड़ा अफसोस वह होगा
जब आखिरी साँस पर दिल कहेगा—

“पूरी जिंदगी लोगों की सोचता रहा...
काश, थोड़ी-सी जिंदगी
अपने लिए भी जी ली होती।”

— कवि: गोपाल गावंडे

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