Category : Dharm

भगवद्गीता में अर्जुन प्रश्न करते हैं कि हे कृष्ण 'स्थितप्रज्ञ' किसे कहते हैं ? भगवान श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं, हे पार्थ,

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प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।। अर्थात् जो मानव अपनी संपूर्ण कामनाओं का त्याग कर, अपनी आत्मा को प्राप्त होता है। और वह उसकी हृदयस्थ आत्मा ही उ...

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अबोधिता में ही चिर आनंद की प्राप्ति संभव है

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अबोधिता या मासूमियत एक ऐसा भाव या अवस्था है जो व्यक्ति को देवतुल्य बना देती है। अबोधिता को यदि समझना है तो हमें उस बचपन की ओर देखना चाहिए जिसका परिचय दुनिया के मायावी संसार से नहीं हुआ है। सहजयोग में ...

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