Category : Dharm

भय, अहंकार और क्रोध का त्याग ही भक्ति का प्रारंभ है

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ज्ञान रुपी चक्षु कोई भी जन्म से ही लेकर नहीं पैदा होता। और न ही इसे कोई स्वयं अपने बलबूते पर धारण कर सकता है। इसे धारण करने के लिए किसी ज्ञानी का सानिध्य जरूरी है। यहां तक कि राम चंद्र जी जैसे अवतरित ...

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सत्य को धारण करने के लिए शुद्ध इच्छा शक्ति व बल चाहिए

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प. पू. श्री माताजी प्रणित सहजयोग एक सत्ययोग है। सत्य के बारे में कहा जाता है कि 'सत्यमेवजयते' अर्थात् सत्य की ही विजय होती है । उपनिषद् में वर्णित है,  'नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो '  न अयम आत्मा बलहिजेन ...

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